होली से राजकीय फुल पलाश का सदियों से है संबंध

सरायकेला जिला के सुदुर वर्ती कुकङु प्रखंड क्षेत्र मे पलाश के फूल का बहुत ही महत्व है ।
आदिवासी संस्कृति और सभ्यता का लगाव आदी काल से पलाश फुल से रहा है । वही बसंत के चढ़ते ही पलाश के पेड़ों पर नारंगी रंग के फूल देख आदिवासी बालाओं का मन झूम उठती हैं । बालाओं के जुड़े में सजने वाला झारखंड के राजकीय फूल पलाश की गरिमा खास है। … खास बात यह है कि होली में रंगों का  भी उपयोग  किया जाता है।
आदिवासी समुदाय के संस्कृति में पलास फूल का महत्वपूर्ण स्थान है । बसंत के चढ़ते ही पलास के पेड़ों पर चटख नारंगी रंग के फूल बालाओं को झूमने पर मजबूर कर देता है । पलाश के फुल खीलते ही सादी विवाह का रस्में सुरू हो जाता है ।पलास वृक्ष की जङ़ और फली औसोधी गुणों से भरपुर है । पलास फूल का आदिवासी संस्कृति व सभ्यता से भी गहरा लगाव है। सास्कृतिक कार्यक्रम समेत विभिन्न आयोजनों में भी इस फूल की महत्ता है। ग्रामीण क्षेत्र मे सादी समारोह मे माला के रूप मे पलाश फुल का ही प्रयोग होता है । और होली मे इसका महत्व ओर बङ जाता है । ग्रामीण क्षेत्र मे पलाश फुल को सुखाकर कुकपीस कर अबीर बनाया जाता है । पलाश फुल को पानी मे भींगोकर होली के दिन रंग बनाया जाता है । लोग बताते हैं की यह प्राकृतिक रंग बनता है जिसे होली खेलने मे किसी भी तरह का खतरा नही होता ।

आधुनिक समय में इस पर्व को लोग पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़ कर देखते हैं क्योंकि इसमें रंगों का इस्तेमाल नहीं होता है और पानी की भी बचत होती है। आदिवासी समुदाय हमेशा से ही पर्यावरण संरक्षण के साथ जल जंगल और जमीन को बचाने की मुहिम में लगे रहते है। वे अपनी पहचान और संस्कृति मानते है। वही आदिवासी महिलाएं पलास फूल को जूड़े में लगाकर श्रृंगार करती हैं। सास्कृतिक कार्यक्रमों में इसका खास स्थान है।

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